भारत बना रहा है खुद का स्पेस शटल, कर लेगा अमेरिका से बराबरी, जानिए सभी खूबियाँ

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भारतीय अनुसंधान संगठन इसरो मंगलयान और नेविगेशन सिस्टम नाविक के बाद अब स्पेस शटल पर काम कर रहा है। इसरो मेड इन इंडिया स्पेस शटल अंतरिक्ष में भेजने की तरफ आगे बढ़ रहा है। अगर यह कार्यक्रम सफल हुआ तो भारत अमेरिका के साथ बराबर खड़ा होगा ।

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क्या होता है स्पेस शटल और किस तरह काम करता है ये आइए जानते हैं
स्पेस शटल अभी तक की सबसे जटिल उड़न मशीन है, जिसकी क्षमता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस उड़न मशीन की सहायता से मनुष्य ऑर्बिट्री प्रयोगशाला के निर्माण के साथ-साथ चंद्रमा और मंगल व अंतरिक्ष के अन्य क्षेत्रों तक पहुंच सकता है।भारत का स्पेस शटल मिशन अभी शुरुआती दौर में है और यह अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा के स्पेश शटल से छोटा भी है। लेकिन भारत की कामयाबी इसी बात से है कि स्पेस एजेंसी इसरो ने इसे स्वदेशी तकनीक से तैयार किया है।
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वैज्ञानिकों का दावा है कि अगर यह सफल रहा तो प्रक्षेपण की लागत 10% रह जाएगी। इसे रीयूजेबल लॉन्च व्हीकल टेक्नोलॉजी डिमांस्ट्रेटर (आरएलवी-टीडी) नाम दिया गया है। परीक्षण के पहले चरण में यह समुद्र की सतह से टकराने के बाद टूट जाएगा। अभी इसे तैरने लायक नहीं बनाया गया है।
सफल होने पर इसे पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम के नाम से ‘कलामयान’ नाम दिया जाएगाअमेरिका की राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान एजेंसी ‘नासा’ द्वारा चलाए जा रहे स्पेस शटल कार्यक्रम के अंतर्गत अभी तक करीब 100 से ज्यादा अभियान किए जा चुके हैं। नासा द्वारा निर्मित स्पेस शटल का आधिकारिक नाम स्पेस ट्रांसपोर्टेशन सिस्टम (एसटीएस) है, जो अमेरिकी सरकार और नासा के मिले-जुले प्रयासों द्वारा अंतरिक्ष यान के रूप में प्रक्षेपित किया गया है
  स्पेस शटल कैसे काम करता है ?
स्पेस शटल का मुख्य भाग दो तिहाई हिस्सों में बटा स्पेसक्राफ्ट होता है। यह लगभग 747 एयरप्लेन (जंबो जेट) के आकार का होता है और इसे ऑर्बिटर कहा जाता है। इसे दो सॉलिड रॉकेट बूस्टर (एसआरबी) की मदद से लॉन्च किया जाता है। जो इसके अंदर के सॉलिड फ्यूल को जलाता है एसआरबी के बीच ही, एक बड़ा एक्सटर्नल टैंक (ईटी) भी इसमें स्थित होता है। इसके अंदर 5,28,000 गैलन (2 मिलियन लीटर) लिक्विड फ्यूल रहता है जो ऑर्बिटर के तीनो इंजनों को चलाता है ईंधन की बड़ी मात्रा की शटल की रफ्तार को एक्सलरेट करने में जरूरत होती है। यह शटल की रफ्तार को 17,500 mph (28,000 km/h) तक पहुंचा देता है जिससे शटल पृथ्वी से 304–528 किलोमीटर दूर 190–330 मील ऑर्बिट पर पहुंच जाता है।हर ऑर्बिटर की कीमत 2 बिलियन डॉलर के करीब होती है और एक शटल मिशन पर 450 मिलियन डॉलर का खर्च आता है।
ऑर्बिटर के तीन मुख्य इंजन होते हैं, जो पीछे की तरफ और स्पेसक्राफ्ट की बॉडी में स्थित होते हैं। हर इंजन 14 फीट (4.3 m) लंबा, 7.5 फीट (2. 3 m) डायमीटर वाला होता है और इसका वजन लगभग 6,700 lb (3039 किलोग्राम) होता है। मुख्य इंजन शटल को जमीन से ऊपर की तरफ धकेलता है शटल कार्गो बे के अंदरः 60 फीट लंबा (18.3 मीटर) और 15 फीट (4.6 मीटर) चौड़ा, ऑर्बिटर कार्गो बे एक सैटलाइट या फिर लाइन में खड़े ट्रकों को ले जाने में सक्षम होता है। इसमें सेंसर्स और साइंटिफिक इंस्ट्रूमेंट्स भी होते हैं।
शटल में कैसी होती है जिंदगीः

शटल मिशन की अवधि दो हफ्ते की होती है इसलिए ऑर्बिटर को आरामदायक परंतु छोटी, टू-स्टोरी लिविंग एरिया की जरूरत होती है। टॉप लेवल पर पायलट की सीट और कॉकपिट कंट्रोल होता है। दूसरे एरिया में स्लीपिंग एरिया, गैलरी किचन, स्टोरेज लॉकर्स और जिम स्थित रहता है। इसमें एक वैक्यूम टॉयलट भी होता है जो स्पेस में काम करता है।
एस्ट्रोनॉट्स धातु की छुरियों, चम्मचों से अपना भोजन करते हैं और चुम्बक की सहायता से धातु की ट्रे को थामते हैं।

यह उन्हें लगभग जीरो ग्रेविटी वाले शटल में इधर उधर जाने से बचाता है।रीएंट्रीः शटल का यूनिक फीचर स्पेस में चले जाना और धरती पर वापस लौटकर आना है। लेकिन इस दौरान जो मुश्किल पेश आती है वह ये कि पृथ्वी के वायुमंडल में पहुंचते ही घर्षण की वजह से ऑर्बिटर 1927°C (3500°F) तक गर्म हो जाता है।
पृथ्वी पर दोबारा वापस आने के दौरान इसे जलने से बचाने के लिए 20 हजार हीट रसिस्टेंट सिरेमिक टाइल्स इसमें लगाई जाती हैं।
इसके ऑर्बिटर में सामान्यतया पांच से सात अंतरिक्ष यात्री यात्रा कर सकते हैं, जिसकी वहन क्षमता 22,700 किलोग्राम की है।
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