भारत की इस सफलता से चीन के छूटे पसीने, नियम बदलने को हुआ मजबूर

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यूं तो भारत और चीन के बीच राइवलरी पूरी दुनिया में मशहूर है और भारत कई मामलों में चीन को टक्‍कर भी देता नजर आता है। हालांकि इसके बाद भी चीन यह मानने को तैयार नहीं होता है कि भारत उसे टक्‍कर दे रहा है। भारत के इकोनॉमिक डेवलपमेंट को अमेरिका के अलावा भले ही यूरोपीय देश मान्‍यता देते हों, लेकिन चीन का दावा है कि भारत को चीन के बराबर आने में बहुत टाइम लगेगा। लेकिन अबकी चीन की छूटे पसीने…

– भारत की ओर से हाल में 5000 किमी रेंज वाली मिसाइल का टेस्‍ट किए जाने पर चीन बौखलाया ही था और पूरे मामले को यूएन में ले जाने की धमकी दे चुका है।

– अबकी बार भारत ने एक और मामले में चीन को ऐसी पटखनी दी है, कि इससे उसके पसीने छूटे गए हैं।

– रोचक बात यह है कि इसके चलते चीन को अपने नियम बदलने के लिए मजबूर होना पड़ा है

भारत ने चीन से छीनी बादशाहत 
– दअरसल दुनिया भर के निवेश (एफडीआई) को अपने देश में आकर्षित करने के मामले में भारत ने चीन को पीछे छोड़ दिया है।
– इसके चलते एफडीआई के मामले में चीन की बादशाहत छिन गई और भारत एफडीआई का नया सरताज बन बैठा।
– भारत ने 2015 में चीन को पीछे छोड़ते हुए दुनिया में सबसे ज्‍यादा एफडीआई आकर्षित करने वाला देश बन गया था।
– इस दौरान जहां भारत ने 63 अरब डॉलर एफडीआई आ‍कर्षित किया था, वहीं चीन के हिस्‍से सिर्फ 56.6 अरब डॉलर ही एफडीआई आया।
चीन ने माना भारत का लोहा
– भारत की इस सफलता के बाद चीन को भारत का लोहा मानने को मजबूर होना पड़ा।
– चीन के कॉमर्स मिनिस्‍टर गाओ हुचेंग ने हाल में माना कि इस साल भी उनके देश में एफडीआई कम आएगा।
– मतलब साफ था कि इस बार भी उनका देश भारत से पीछे रहेगा।
– हुचेंग ने माना कि इस बार चीन में एफडीआई के रेट पिछले साल के 6.4 फीसदी के मुकाबले इस साल 3.8 फीसदी के आसपास ही रहेगा।
भारत से पिछड़ने के बाद चीन ने बदले नियम 
– भारत से 2 साल से मात खाने के बाद अब चीन को एफडीआई को लेकर अपने नियमों को बदलने के लिए मजबूर होना पड़ा है।
– चीन ने इसके चलते कुछ ऐसे सेक्‍टर को खोलने का फैसला किया है, जिन्‍हें अभी तक विदेशी निवेश के लिए नहीं खोला गया था।
– इसमें परिवहन और रेलवे जैसे सेक्‍टर भी शामिल हैं।
– चीन ने एफडीआई के लिए रिस्टिक्‍टेड सेगमेंट की संख्‍या को 93 से घटाकर अब 62 कर दिया है।
करंसी के मामले में भी भारत ने चीन को पीछे छोड़ा
– यूं तो चीनी यूआन भारतीय रुपए से महंगा है, लेकिन ग्‍लोबल स्थिरता के मामले में भी 2016 में भारतीय रुपया चीनी युआन को पीछे छोड़ गया।
– ट्रम्‍म के चुनाव जीतने और स्‍लोडाउन के चलते 2016 में डॉलर के मुकाबले चीनी युआन बुरी तरह ढह गया।
– पूरे साल के दौरान युआन में डॉलर के मुकाबले 6 फीसदी की भारी कमजोरी देखी गई, जो चीन जैसी बड़ी इकोनॉमी के लिए खतरे से कम नहीं है।
– वहीं विपरीत ग्‍लोबल हालातों के बाद भी भारतीय रुपया करंसी मार्केट में मजबूती के साथ पैर जमाए रहा और पूरे साल के दौरान इसमें 1 फीसदी से भी कम की कमी रही।
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